दत्तात्रेय जयंती (Dattatreya Jayanti) हिंदू धर्म की एक अत्यंत पवित्र पर्व है जो भगवान दत्तात्रेय (Lord Dattatreya) के जन्म दिवस के रूप में मनाई जाती है। भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेव - ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) का संयुक्त अवतार माना जाता है। इसलिए उन्हें ज्ञान, तपस्या और भक्ति का प्रतीक कहा गया है।
हर वर्ष मार्गशीर्ष माह के पूर्णिमा (पूर्ण चंद्र दिवस) को दत्तात्रेय जयंती (Datta Jayanti) मनाई जाती है। इस दिन भक्त उपवास रखते हैं, कथा और भजन-कीर्तन करते हैं तथा भगवान दत्तात्रेय की पूजा करते हैं।
दत्तात्रेय जयंती पूजा विधि (Dattatreya Puja Vidhi)
दत्तात्रेय जयंती व्रत और पूजा विधि (dattatreya puja vidhi) सरल होते हुए भी अत्यंत फलदायी है। भक्त इस दिन उपवास रखते हैं और पूरे दिन भगवान दत्तात्रेय का ध्यान करते हैं।
व्रत की विधि इस प्रकार है:
माता अनसूया अपनी पवित्रता, करुणा और भक्ति के लिए पूरे लोक में प्रसिद्ध थीं। उनकी इच्छा थी कि उन्हें ऐसा पुत्र प्राप्त हो जो स्वयं भगवान के समान दिव्य और ज्ञानवान हो। इसी उद्देश्य से उन्होंने और अत्रि मुनि ने वर्षों तक कठोर तपस्या आरंभ की।
दिन-रात वे एक ही संकल्प दोहराते — “हे प्रभु, हमें ऐसा पुत्र दो जो संसार का मार्गदर्शक बने, जो सबका कल्याण करे।”
उनकी तपस्या इतनी गहन थी कि तीनों लोकों में उसकी आभा फैल गई। ब्रह्मलोक, विष्णुलोक और कैलाश पर्वत तक उनकी साधना की शक्ति पहुँच गई।
आख़िरकार, उनकी सच्ची निष्ठा और भक्ति से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी, विष्णु जी और महेश (शिव जी) तीनों देवता स्वयं उनके आश्रम में प्रकट हुए।
तीनों देवताओं के दर्शन से पूरा वन आलोकित हो उठा।
माता अनसूया ने विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा —
“भगवान, मैं चाहती हूँ कि मेरा पुत्र ऐसा हो जो सृष्टि के कल्याण के लिए जन्म ले, जो ज्ञान और भक्ति का प्रतीक बने।”
तीनों देवताओं ने मुस्कुराकर आशीर्वाद दिया और बोले —
“हे अनसूया, तुम्हारी तपस्या ने हमें प्रसन्न किया है। इसलिए हम तीनों मिलकर तुम्हारे घर एक ही पुत्र के रूप में जन्म लेंगे।”
कुछ समय बाद, एक अद्भुत और तेजस्वी बालक का जन्म हुआ। उस बालक के मुख पर त्रिदेवों की झलक थी। यह कोई साधारण बालक नहीं था — यह थे भगवान दत्तात्रेय (Lord Dattatreya), जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्तियों का संगम थे।
जैसे-जैसे दत्तात्रेय जी बड़े हुए, वे अपने भीतर अद्भुत ज्ञान, वैराग्य और करुणा लेकर संसार के कल्याण के लिए कार्य करने लगे। उन्होंने लोगों को सिखाया कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और गुरु के ज्ञान में है।
दत्तात्रेय जी ने योग, ध्यान और ब्रह्मज्ञान के माध्यम से लोगों को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का कार्य किया।
वे स्वयं एक चलते-फिरते गुरु बन गए — जिन्होंने यह बताया कि प्रकृति की हर वस्तु में ईश्वर का दर्शन किया जा सकता है।
इसलिए, आज भी जब हम दत्तात्रेय जयंती (Dattatreya Jayanti) मनाते हैं, तो यह केवल जन्मोत्सव नहीं होता, बल्कि ज्ञान, गुरु-भक्ति और आत्मज्ञान के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
यह कथा हमें याद दिलाती है कि सच्ची भक्ति और निष्ठा से असंभव भी संभव हो सकता है — और भगवान स्वयं अपने भक्तों के घर जन्म लेते हैं।
दत्तात्रेय जयंती का इतिहास (datta jayanti significance) वैदिक युग से जुड़ा है। माना जाता है कि इस दिन ब्रह्म, विष्णु और शिव ने दत्तात्रेय के रूप में अवतार लिया था ताकि मानवता को ज्ञान और धर्म का मार्ग दिखाया जा सके।
उनकी शिक्षाएँ गुरु-शिष्य परंपरा का मूल आधार मानी जाती हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और आंध्र प्रदेश में श्री दत्तात्रेय मंदिरों (Shree Datta Jayanti celebrations) में इस दिन विशेष पूजा, भजन, कथा और साधना आयोजित की जाती है।
यह दिन हमें याद दिलाता है कि विनम्रता, सेवा और ज्ञान के बिना जीवन अधूरा है। जो व्यक्ति श्रद्धा से इस दिन पूजा करता है, वह भगवान की कृपा से भय, मोह और भ्रम से मुक्त होता है।
प्रश्न 1: दत्तात्रेय जयंती कब मनाई जाती है?
उत्तर: दत्तात्रेय जयंती हर वर्ष मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है। 2025 में यह 4 दिसंबर, को पड़ेगी।
प्रश्न 2: दत्तात्रेय जयंती का महत्व क्या है?
उत्तर: इस दिन भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ था जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव के संयुक्त अवतार हैं। इस दिन व्रत करने से आत्मिक शांति और मोक्ष प्राप्त होता है।
प्रश्न 3: दत्तात्रेय जयंती व्रत कैसे करें?
उत्तर: प्रातः स्नान कर भगवान दत्तात्रेय की पूजा करें, “ॐ दत्तात्रेयाय नमः” मंत्र का जाप करें और व्रत रखें।
प्रश्न 4: दत्तात्रेय जयंती का इतिहास क्या है?
उत्तर: ऋषि अत्रि और माता अनसूया की तपस्या से भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ। वे त्रिदेवों के सम्मिलित रूप हैं।
प्रश्न 5: क्या महिलाएँ भी यह व्रत रख सकती हैं?
उत्तर: हाँ, पुरुष और महिलाएँ दोनों श्रद्धा से यह व्रत कर सकते हैं। यह सभी के लिए शुभ माना जाता है।
प्रश्न 6: दत्तात्रेय जयंती पर क्या दान करना चाहिए?
उत्तर: इस दिन अन्न, वस्त्र, और गौदान विशेष पुण्य देता है। ब्राह्मणों को भोजन कराना भी अत्यंत फलदायी होता है।
प्रश्न 7: दत्तात्रेय जयंती पर क्या करना चाहिए?
उत्तर: भगवान दत्तात्रेय की आराधना करें, व्रत रखें, कथा सुनें, और जरूरतमंदों की सेवा करें।
प्रश्न 8: दत्तात्रेय जयंती और गुरु तत्व का क्या संबंध है?
उत्तर: भगवान दत्तात्रेय को गुरु का रूप माना गया है। इसलिए यह दिन गुरु भक्ति और आत्मज्ञान के जागरण का प्रतीक है।
पूरब पश्चिम विशेष
Hanuman Jayanti | Narasimha Jayanti | Shani Jayanti | Gita Jayanti